समझना चाहती हू,
इन खामोशियों को,
इन बारिशो की बूंदो को,
इन मंद मंद चलने वाली हवाओ को,
अनायास प्रकृति के खुश हो जाने को,
फूलो के प्रफुल्लित होने को,
मेघों के गर्जन को,
फिर अचानक से खामोश हो जाने को,
मेघों मे उभरे अनकहे चित्रों को,
पानी की टप टप को,
हवाओ के झोके को,
फिर शांत हो जाने को.
पक्षियों के कलरव को,
उनकी आपस मे होने वाली बैठक को,
अपने कदमों के पदचापो को,
कण कण मे बसी वो खामोश ध्वनि को,
साँय साँय करते इस सन्नाटे को,
समझना चाहती हूं।।
पूजा गिरि
👍🏼
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